बिस्कोहर की माटी – विश्वनाथ त्रिपाठी की आत्मकथा नंगातलाई का गाँव का अंश
बिस्कोहर की माटी – विश्वनाथ त्रिपाठी की आत्मकथा नंगातलाई का गाँव का अंश
परिचय
हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक और लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी (जन्म 1931) ने अपनी आत्मकथा “नंगातलाई का गाँव” में गाँव और बचपन की स्मृतियों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। इसका एक प्रसिद्ध अंश है – “बिस्कोहर की माटी”, जिसमें लेखक ने अपने गाँव, प्रकृति, माँ की ममता और ग्रामीण जीवन शैली का अद्भुत चित्रण किया है।
लेखक परिचय – विश्वनाथ त्रिपाठी
- जन्म: बिस्कोहर गाँव, ज़िला बस्ती (सिद्धार्थनगर), उत्तर प्रदेश।
- शिक्षा: कानपुर, वाराणसी और पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ (पीएच.डी.)।
- दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन, बाद में स्वतंत्र लेखन।
- प्रमुख कृतियाँ: प्रारंभिक अवधी, हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास, लोकवादी तुलसीदास, मीरा का काव्य, देश के इस दौर में, पेड़ का हाथ, जैसा कह सका आदि।
- सम्मान: गोकुलचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, रामविलास शर्मा सम्मान, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार आदि।
बिस्कोहर की माटी का सारांश
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प्राकृतिक सौंदर्य – पोखरों के कमल, कोइयाँ, हरसिंगार, जूही, कदंब और सरसों के फूलों का चित्रण।
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ग्रामीण जीवन शैली – अकाल के समय कमल-ककड़ी खाना, बाढ़ की समस्याएँ, लू से बचाव के घरेलू उपाय।
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भय और लोकविश्वास – साँपों, बिच्छुओं और उनसे जुड़ी लोक मान्यताएँ।
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माँ और बचपन – माँ की ममता, दूध पिलाने के दृश्य, छोटे भाई के जन्म का असर।
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ऋतुओं का चित्रण – गर्मी की लू, वर्षा का संगीत और बाढ़, शरद की चाँदनी।
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नारी-सौंदर्य अनुभव – जूही और चाँदनी से तुलना, अप्राप्त प्रेम की स्मृति।
मुख्य विशेषताएँ
- आत्मकथात्मक और स्मृतिपरक शैली।
- प्रकृति और संवेदना का अद्भुत संगम।
- ग्रामीण जीवन के दुख-सुख का यथार्थ चित्रण।
- आंचलिक भाषा और लोक तत्वों का प्रयोग।
निष्कर्ष
“बिस्कोहर की माटी” केवल एक आत्मकथात्मक अंश नहीं, बल्कि यह भारतीय गाँवों की संस्कृति, लोकजीवन और प्रकृति के गहरे संबंध का जीवंत दस्तावेज़ है। विश्वनाथ त्रिपाठी ने इसमें यह दिखाया है कि गाँव की साधारण मिट्टी, फूल, ऋतुएँ और माँ की ममता जीवनभर की प्रेरणा और संवेदना का स्रोत बन जाती हैं।

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