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अपना मालवा – खाऊ-उजाड़ सभ्यता में | प्रभाष जोशी का निबंध सारांश

 अपना मालवा – खाऊ-उजाड़ सभ्यता में | प्रभाष जोशी का निबंध सारांश


परिचय

हिंदी पत्रकारिता के महान स्तंभ और संवेदनशील लेखक प्रभाष जोशी (1937–2009) का निबंध “अपना मालवा – खाऊ-उजाड़ सभ्यता में” पर्यावरण और संस्कृति की चिंता को व्यक्त करता है। इसमें लेखक ने मालवा की धरती, नदियाँ, तालाब और वर्षा का चित्रण करते हुए आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के दुष्परिणामों पर प्रकाश डाला है।

लेखक परिचय – प्रभाष जोशी

  • जन्म: इंदौर, मध्य प्रदेश।
  • पत्रकारिता की शुरुआत नई दुनिया से, राजेंद्र माथुर के सान्निध्य में।
  • इंडियन एक्सप्रेस, प्रजापति, सर्वोदय संदेश से जुड़े।
  • 1983 में जनसत्ता अखबार के संस्थापक संपादक बने।
  • प्रमुख स्तंभ: “कागद कारे”
  • कृतियाँ: कागद कारे (लेख संग्रह), हिंदू होने का धर्म (2005)।
  • विशेषता: बोलचाल की भाषा का प्रयोग, खेल, सिनेमा और संस्कृति जैसे विषयों पर गंभीर लेखन।

निबंध का सारांश

  1. मालवा का पुराना स्वरूप

  2. “डग-डग रोटी, पग-पग नीर” (हर कदम पर अन्न और जल)।

  3. नदियाँ, तालाब और बावड़ियाँ जीवनदायिनी थीं।
  4. वर्तमान स्थिति

    • नदियाँ सूख गईं, तालाब गाद से भर गए।

    • नगरों की नदियाँ गंदे नालों में बदल गईं।

    • पानी की सामान्य बारिश भी अब संकट जैसी लगती है।

  5. तालाब और परंपरागत जल प्रबंधन

    • विक्रमादित्य और भोज जैसे शासकों ने तालाब और बावड़ियाँ बनवाकर पानी रोका।

    • आधुनिक इंजीनियरों ने इन्हें उपेक्षित कर दिया।

  6. खाऊ-उजाड़ सभ्यता

    • यूरोप और अमेरिका की उपभोक्तावादी संस्कृति।

    • औद्योगिक विकास ने प्रकृति को उजाड़ दिया।

    • कार्बन गैसों से धरती गरम, मौसम चक्र असंतुलित।

  7. लेखक की चेतावनी

    • यह संकट सिर्फ मालवा नहीं, पूरे विश्व का है।

    • यदि हमने जल-संरक्षण और पर्यावरण पर ध्यान न दिया तो सभ्यता उजड़ जाएगी।

संदेश

  • विकास तभी सार्थक है जब वह प्रकृति और संस्कृति के संतुलन के साथ हो।
  • परंपरागत जल प्रबंधन प्रणालियाँ हमें दुष्काल से बचा सकती हैं।
  • पश्चिमी उपभोक्तावादी जीवनशैली को अपनाकर हम अपनी जड़ें खो रहे हैं।
  • पर्यावरण संरक्षण ही जीवन का सच्चा आधार है।

निष्कर्ष

“अपना मालवा – खाऊ-उजाड़ सभ्यता में” एक संवेदनशील निबंध है जो हमें बताता है कि आधुनिक औद्योगिक सभ्यता ने हमें समृद्धि नहीं, बल्कि विनाश और उजाड़ दिया है। प्रभाष जोशी ने मालवा की धरती के बहाने पूरी दुनिया को चेताया है कि यदि हमने प्रकृति को न सँभाला तो हम अपनी ही जीवन-शैली के शिकार बन जाएँगे।

अपना मालवा – खाऊ-उजाड़ सभ्यता में | प्रभाष जोशी का निबंध सारांश Reviewed by साहित्य संगम on September 10, 2025 Rating: 5

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