कृतिका भाग 2 माता का आँचल :
माता का आँचल : पाठ का सारांश
'माता का आँचल'
पाठ लेखक शिवपूजन सहाय द्वारा
लिखा गया एक आत्मकथात्मक अंश है। इसमें लेखक ने अपने बचपन के दिनों का, अपने पिता और माता के साथ बिताए समय का और ग्रामीण परिवेश में बच्चों के
खेल-कूद का मार्मिक चित्रण किया है।
पिता का वात्सल्य: लेखक का बचपन का नाम तारकेश्वरनाथ था,
लेकिन उनके पिता उन्हें प्यार से भोलानाथ कहते थे।
लेखक का अधिकांश समय अपने पिता के साथ ही गुजरता था। वे उनके साथ सोते, सुबह उठते, पूजा करते और गंगा नदी में मछलियों को
आटे की गोलियाँ खिलाने जाते थे। पिता उनकी हर शरारत पर मुस्कुराते थे और उन्हें
बहुत लाड़-प्यार करते थे।
बच्चों के खेल-कूद: लेखक और उनके मित्र विभिन्न
प्रकार के खेल खेलते थे। कभी वे चबूतरे को नाटक घर बना लेते थे,
कभी बाबूजी की चौकी को रंगमंच बना देते थे। वे मिट्टी के घरौंदे
बनाते, तरह-तरह के खेल खेलते, और
कभी-कभी तो बारात का जुलूस भी निकालते थे, जिसमें लेखक के
बाबूजी भी शामिल होकर बच्चों का आनंद बढ़ाते थे।
माँ का ममत्व: हालाँकि लेखक अपने पिता के साथ ज्यादा समय बिताते थे,
लेकिन जब भी वे डर जाते या चोटिल होते, तो
उन्हें अपनी माँ की गोद में ही सबसे अधिक सुरक्षित महसूस होता था। एक बार जब एक
बिच्छू देखकर बच्चे डर के मारे भाग रहे थे और लेखक गिरकर घायल हो गए, तो वे अपने बाबूजी की पुकार को अनसुना कर सीधे अपनी माँ की गोद में चले
गए।
निष्कर्ष: यह पाठ दर्शाता है कि भले ही बच्चा अपने पिता के साथ अधिक सहज हो,
लेकिन संकट के समय उसे माँ की गोद में ही सबसे अधिक सुरक्षा और
शांति मिलती है। यह कहानी पिता के स्नेह और माँ के ममत्व के बीच के गहरे और अटूट
रिश्ते को दर्शाती है।

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