नाटक लिखने का व्याकरण कक्षा 12 ऐच्छिक
नाटक लिखने का व्याकरण कक्षा 12 ऐच्छिक
नाटक किसे कहते हैं -
- भारतीय काव्यशास्त्र में दो तरह के काव्य माने गए हैं- एक दृश्य काव्य और दूसरा श्रव्य काव्य।
- नाटक को दृश्य काव्य कहा गया है, क्योंकि इसे देखा भी जाता है और पढ़ा भी।
- यह साहित्य की ऐसी विधा है जिसे पढ़ा, सुना और देखा जा सकता है।
- एक सफल नाटक वही होगा जो अभिनय के साथ-साथ पठनीय भी हो।
- नाटक को रंगमंच पर अभिनेता, सह-कलाकार और निर्देशक मिलकर प्रस्तुत करते हैं।
नाटक और साहित्य की अन्य विधाओं में अन्तर :
- साहित्य की अन्य विधाएँ हैं- कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि। स्वयं नाटक भी इनमें से ही. एक विधा है किन्तु नाटक की अपनी कुछ अन्य विशेषताएँ भी हैं, जैसे नाटक दृश्य-काव्य होता है।
- नाटक का मुख्य गुण: यह दृश्य माध्यम है।
- अन्य विधाओं को पढ़ा/सुना जाता है, लेकिन नाटक को देखा जाता है।
- नाटक की सरसता मंचन से प्राप्त होती है।
नाटक की भाषा-शैली –
- भाषा सरल, सहज और प्रसंगानुकूल होनी चाहिए।
- पौराणिक नाटकों में तत्सम प्रधान भाषा।
- मुगलकालीन नाटकों में उर्दू शब्दों का प्रयोग।
- आधुनिक नाटकों में खड़ी बोली व अंग्रेज़ी, उर्दू, अरबी-फारसी शब्दों का प्रयोग।
नाटक के तत्त्व-नाटक में निम्नलिखित
तत्त्व होते हैं :
· समय का बंधन: नाटककार को समय का विशेष ध्यान रखना
पड़ता है।
·
एक
निश्चित समय में नाटक प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
·
दर्शकों
के धैर्य को ध्यान में रखते हुए समय तय होता है।
· शब्द: नाटक का दूसरा महत्त्वपूर्ण तत्त्व 'शब्द' है।
·
'शब्द' नाटक का शरीर होता है। ।
·
सांकेतिक
और व्यंजनापरक भाषा नाटक को प्रभावी बनाती है।
· कथ्य: नाटककार को यह ध्यान रखना चाहिए कि
नाटक मंच पर अभिनीत होगा।
·
घटनाएँ
क्रमबद्ध होनी चाहिए।
·
शून्य
से शिखर तक विकास की प्रक्रिया होनी चाहिए।
· संवाद: नाटक का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व
संवाद है।
·
संवादों
से ही चरित्रों का विकास होता
है और कथ्य गतिशील बनता
है।
·
संवाद सहज, स्वाभाविक और प्रसंगानुकूल होने
चाहिए।
नाटक में स्वीकार और अस्वीकार की अवधारणा
-
- नाटक में स्वीकार के स्थान पर अस्वीकार का अधिक महत्त्व होता है।
- कोई भी दो चरित्र जब आपस में मिलते हैं तो विचारों के आदान-प्रदान
में टकराहट होती है।
- रंगमंच में कभी भी यथास्थिति को स्वीकार नहीं किया जाता।
- वर्तमान में स्थिति के प्रति असंतोष का भाव, छटपटाहट, प्रतिरोध और अस्वीकार जैसे नकारात्मक तत्त्वों के समावेश से ही नाटक सशक्त बनता है।
- अतः हम देखते हैं कि हमारे देश के नाटकों में राम की अपेक्षा रावण, प्रह्लाद के स्थान पर हिरण्यकश्यप का चरित्र अधिक आकर्षित करता है।
- यद्यपि विचार,
व्यवस्था अथवा तात्कालिक समस्या को भी
नाटक में सहज स्वीकार किया गया है तथापि इस प्रकार के लिखे गए नाटक लम्बे समय तक
लोकप्रिय नहीं हो पाए।

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