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क्षितिज भाग 2 नौबतखाने में इबादत

 

नौबतखाने में इबादत : पाठ का सारांश

'नौबतखाने में इबादत' प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन पर आधारित एक व्यक्ति-चित्र है, जिसे लेखक यतींद्र मिश्र ने लिखा है। यह पाठ बिस्मिल्ला खाँ के जीवन, उनकी कला, और उनके धार्मिक समन्वय को दर्शाता है।

डुमराँव से काशी तक: बिस्मिल्ला खाँ (अमीरुद्दीन) का जन्म बिहार के डुमराँव में हुआ था। शहनाई के लिए आवश्यक नरकट घास यहीं सोन नदी के किनारे मिलती है। वे पाँच-छह साल की उम्र में अपने नाना के साथ काशी आ गए और वहीं शहनाई की शिक्षा प्राप्त की।

संगीत की शुरुआत: उनकी संगीत साधना की शुरुआत बालाजी मंदिर के नौबतखाने से हुई, जहाँ उनके अब्बाजान और मामा शहनाई बजाते थे। वे बालाजी मंदिर तक जाने वाले रास्ते में रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से संगीत सुनकर प्रभावित हुए, जिसे वे अपनी संगीत शिक्षा का पहला पाठ मानते हैं।

शहनाई का महत्व: शहनाई को 'सुषिर वाद्यों में शाह' कहा गया है। यह मंगल ध्वनि का प्रतीक है और सभी शुभ कार्यों में बजाई जाती है।

धार्मिक समन्वय: बिस्मिल्ला खाँ एक पक्के मुसलमान थे, लेकिन उनकी आस्था काशी विश्वनाथ और बालाजी मंदिर में भी अटूट थी। वे मुहर्रम के दस दिनों तक शहनाई नहीं बजाते थे और शोक मनाते थे। वहीं, काशी से बाहर रहने पर भी वे विश्वनाथ मंदिर की दिशा में मुँह करके ही रियाज़ करते थे। यह उनके धर्मनिरपेक्ष और गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है।

कला और सादगी: भारतरत्न जैसा सर्वोच्च सम्मान पाने के बाद भी वे अपनी सादगी नहीं छोड़े। जब एक शिष्य ने उन्हें फटी धोती पहनने पर टोका, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा कि 'भारत रत्न' उन्हें शहनाई पर मिला है, उनकी लंगोटी पर नहीं।

निष्कर्ष: यह पाठ बिस्मिल्ला खाँ के जीवन के माध्यम से यह संदेश देता है कि सच्ची कला और भक्ति किसी धर्म या दिखावे की मोहताज नहीं होती। उनकी मृत्यु (21 अगस्त, 2006) के साथ संगीत की एक महान परंपरा का अंत हुआ, लेकिन उनका योगदान हमेशा जीवित रहेगा।

क्षितिज भाग 2 नौबतखाने में इबादत Reviewed by साहित्य संगम on September 02, 2025 Rating: 5

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