“शब्द शक्ति: अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शक्ति की संपूर्ण जानकारी”
“शब्द शक्ति: अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शक्ति की संपूर्ण जानकारी”
इस पोस्ट में हम “शब्द शक्ति” के महत्व और प्रकार जैसे अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शक्ति को विस्तार से समझेंगे। उदाहरणों के साथ वाचक, लक्षक और व्यंजक शब्दों का विवरण प्राप्त करें।
परिभाषा – शब्द के अर्थ को जिस माध्यम से ग्रहण किया जाता है, वह
माध्यम शब्द-शक्ति कहलाता है।
भारतीय काव्य – शास्त्र के प्रकांड विद्वान् मम्मट ने अपनी पुस्तक ‘काव्यप्रकाश’
में तीन प्रकार के शब्द और तीन प्रकार के अर्थ का निर्देश किया है।
उन्होंने वाच्य, लक्ष्य और व्यंग्य तीन प्रकार के अर्थ माने
हैं।
शब्द के उपर्युक्त विभाजन को हम
इस प्रकार समझ सकते हैं –
(1) वाचक शब्द – (वाच्य अर्थी)
– वक्ता द्वारा बोले गये वाक्य का सीधा अर्थ
ग्रहण करना। जैसे-‘मैं राजस्थानी हूँ।’ इसमें वक्ता के इस वाक्य का सीधा (वाच्य) अर्थ होगा कि वह राजस्थान का
रहने वाला है।
(2) लक्षक शब्द – (लक्ष्य अर्थ)- जहाँ वक्ता द्वारा बोले गये शब्द का लक्षणों के आधारे अर्थ ग्रहण किया
जाय। जैसे-मैं राजस्थानी हूँ । इस वाक्य में यदि ‘राजस्थानी’
को राजस्थान की संस्कृति का द्योतक माना जाय, तो
यह लक्षण शब्द होगा और राजस्थानी संस्कृति इसका लक्ष्यार्थ होगा।
(3) व्यंजक शब्द – (व्यंग्य अर्थ) – जहाँ वक्ता का भाव लक्षणों द्वारा भी अभिव्यक्त नहीं हो पाता और अन्य अर्थ
की कल्पना करनी होती है, वहाँ शब्द व्यंजक होता है। जैसे
(सावधान !) मैं राजस्थानी हूँ।’ राजस्थानी’ शब्द का अभिप्रेत अर्थ लक्षणों से प्राप्त नहीं होता है, किन्तु इससे राजस्थान के वीरों की वीरता व्यंजित होती है । अत : यह शब्द
व्यंजक है और इसका व्यंग्य अर्थ है- ‘वीरता’।
(2) लक्षक शब्द – (लक्ष्य अर्थ)- जहाँ वक्ता द्वारा बोले गये शब्द का लक्षणों के आधारे अर्थ ग्रहण किया जाय। जैसे-मैं राजस्थानी हूँ । इस वाक्य में यदि ‘राजस्थानी’ को राजस्थान की संस्कृति का द्योतक माना जाय, तो यह लक्षण शब्द होगा और राजस्थानी संस्कृति इसका लक्ष्यार्थ होगा।
(3) व्यंजक शब्द – (व्यंग्य अर्थ) – जहाँ वक्ता का भाव लक्षणों द्वारा भी अभिव्यक्त नहीं हो पाता और अन्य अर्थ की कल्पना करनी होती है, वहाँ शब्द व्यंजक होता है। जैसे (सावधान !) मैं राजस्थानी हूँ।’ राजस्थानी’ शब्द का अभिप्रेत अर्थ लक्षणों से प्राप्त नहीं होता है, किन्तु इससे राजस्थान के वीरों की वीरता व्यंजित होती है । अत : यह शब्द व्यंजक है और इसका व्यंग्य अर्थ है- ‘वीरता’।
शब्द के उपर्युक्त विभाजन के आधार
पर शब्द की क्रमशः तीन शक्तियाँ मानी गई हैं। ये निम्नलिखित हैं –
1.
अभिधा शक्ति2.
लक्षणा शक्ति3.
व्यंजना शक्ति
1. अभिधा-शक्ति
- वाच्यार्थ (मुख्यार्थ) का बोध कराने वाली शक्ति को अभिधा शक्ति कहा जाता है। अभिधा को संबंध शब्द का एक ही अर्थ ग्रहण करने से है।
- उदाहरणार्थ – किसी ने कहा- पानी दो, इस वाक्य का अर्थ अभिधा के
माध्यम से कवल इतना ही होगा कि पानी पीने के लिए। माँगा गया है। वस्तुत: अभिधा में
जो बोला जाता है और सुनकर प्रथम बार में ही जो अर्थ ग्रहण किया जाता है, वही अर्थ-ग्रहण की प्रक्रिया इसके अंतर्गत आती है।
अन्य उदाहरण –
1.
‘किसान फसल काट रहा
है।‘ इस वाक्य में अभिधा शब्द-शक्ति के माध्यम से यही
प्रकट होता है कि फसल किसान द्वारा काटी जा रही है।
2.
‘बिल्ली भाग रही
है। इस वाक्य में केवल बिल्ली का भागना ही प्रकट
होता है। अत: वाच्यार्थ का ही ग्रहण होने से अभिधा शब्द शक्ति प्रकट होती है।
3.
‘जयपुर राजस्थान की
राजधानी है।’ यहाँ भी वाच्यार्थ का सीधे ही अर्थ ग्रहण हो
रहा है। अत: अभिधा शब्द शक्ति है।
2. लक्षणा-शक्ति
- जब शब्द के वाच्यार्थ (मुख्यार्थ)
का अतिक्रमण कर किसी दूसरे अर्थ को ग्रहण किया जाता है,
तब उसे लक्ष्यार्थ कहते हैं। लक्ष्यार्थ का बोध कराने वाली शक्ति को
लक्षणा-शक्ति कहा जाता है। जबे वक्ता अपने वाक्य में मुख्यार्थ से हटकर कुछ अन्य
अर्थ भरने की कोशिश करता है, तब लक्षणों के आधार पर
अर्थ-ग्रहण किया जाता है।
लक्षणा के भेद – काव्यशास्त्र के आचार्यों ने लक्षण के दो प्रमुख भेद माने हैं –
1.
रूढ़ा लक्षणा
2.
प्रयोजनवती लक्षणा।
(1) रूढ़ा लक्षणा – जब किसी काव्य-रूढ़ि (परम्परा) को आधार बनाकर लक्षणा-शक्ति का प्रयोग किया
जाता है, तो वहाँ रूढ़ा लक्षणा मानी जाती है । जैसे- भारत
जाग उठा’ इस वाक्य में ‘भारत’ से वक्ता का तात्पर्य ‘भारत देश’ न होकर भारतवासी हैं। ‘भारत’ शब्द
का भारतवासी अंर्थ में प्रयोग कविगण तथा लेखक करते आ रहे हैं। इसी रूढ़ि को आधार
बनाकर भारतवासियों के सचेत और जागरूक होने की बात कही गई है। इसी प्रकार अन्य
उदाहरण हैं –
1.
इंग्लैण्ड की चार
विकेट से पराजय।
2.
भरत हंस रवि वंश
तडागा।
3.
वहाँ लाठियाँ चल रही
हैं।
4.
बड़े हरिश्चन्द्र
बनते हो।
5.
कश्मीर रक्त में डूबा
हुआ है।
- यहाँ ‘इंग्लैण्ड’ शब्द से इंग्लैण्ड के क्रिकेट खिलाड़ी,
‘हंस’ से गुण-दोष का ज्ञाता, लाठियाँ’ से लाठी चलाते व्यक्ति, ‘हरिश्चन्द्र’ से सत्य बोलने वाला तथा ‘कश्मीर’ से कश्मीर निवासियों का तात्पर्य रूढ़ि पर
आधारित है । अतः उपर्युक्त वाक्यों में रूढ़ा लक्षणा-शक्ति का प्रयोग है।
(2) प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ विशेष प्रयोजन से प्रेरित होकर शब्द का प्रयोग लक्ष्यार्थ में किया
जाता है, तो वहाँ प्रयोजनवती लक्षणा मानी जाती है। जैसे-‘तुम तो निरे गधे हो।’ इस वाक्य में ‘गधा’ शब्द का ‘मूर्ख’ के अर्थ में प्रयोग विशेष प्रयोजन से हुआ है। अत: यहाँ प्रयोजनवती लक्षणा
है। इसी प्रकार अन्य उदाहरण हैं –
1.
आओ मेरे शेर।
2.
उसका मन पत्थर का बना
है।
3.
हम तो गंगावासी हैं।
4.
यह ताजमहल कब तक पूरा
होगा?
5.
यह यमुना-पुत्रों का
नगर है।
- इन वाक्यों में प्रयुक्त काले छपे
शब्दों का प्रयोग विशेष प्रयोजन से हुआ है। यहाँ ‘शेर’ अर्थात् ‘शेर’ जैसे गुणों वाला, निर्भीक और बलशाली, ‘पत्थर’ अर्थात् पत्थर जैसे कठोर हृदय वाला, ‘गंगावासी’ अर्थात् गंगा जैसी पवित्रता से युक्त,
‘ताजमहल’ अर्थात् ताजमहल जैसा भव्य भवन और ‘यमुना-पुत्र’ अर्थात् यमुना पर आधारित आजीविका वाला
होगा।
3. व्यंजना-शक्ति
- वाच्यार्थ (मुख्यार्थ) लक्ष्यार्थ (लक्ष्य) और संकेतित अर्थ के पश्चात् जब किसी विलक्षण अर्थ की प्रतीति होती है, उसे व्यंग्यार्थ (व्यंजनार्थ, ध्वन्यार्थ) कहते हैं। जिस शब्द शक्ति से व्यंग्यार्थ का बोध होता है, उसे व्यंजना शक्ति कहते हैं।
- जब यह कहा जाये,
‘क्यों क्या समय हुआ है ? ‘तो वक्ता का
तात्पर्य न तो घड़ी का समय पूछना है और न समय का आभास देना है, अपितु उसका तात्पर्य है यह कोई समय है आने का ? यह
अर्थ न मुख्यार्थ ग्रहण करने से प्राप्त होगा, न लक्ष्यार्थ
से। यही व्यंग्यार्थ है।
व्यंजना के भेद – व्यंजना शक्ति के दो भेद होते हैं- शाब्दी व्यंजना व आर्थी व्यंजना।
1.
शाब्दी व्यंजना – जहाँ व्यंग्यार्थ किसी विशेष शब्द के प्रयोग पर आश्रित रहता है,
वहाँ शाब्दी व्यंजना होती है। इसका प्रयोग अनेकार्थवाची शब्दों के
प्रयोग में होता है।
2.
आर्थी व्यंजना – जहाँ व्यंग्यार्थ अर्थ पर ही आश्रित रहता है,
वहाँ आर्थी व्यंजना होती है ।
उदाहरण – (1)
कुम्हार बोला, “बेटी, बादल
हो रहे हैं”।
उक्त वाक्य में भिन्न-भिन्न
व्यंग्यार्थ निकल रहे हैं, जैसे-बर्तन अन्दर ले लो। मिट्टी गीली हो जायेगी।
हमें बाहर नहीं जाना चाहिए।
(2) उसने कहा, ”संध्या हो गई।”
इसके कई व्यंग्यार्थ हैं, जैसे- गायों के आने
का समय हो गया है। बत्ती जलाने का समय है। हमें मन्दिर चलना है। आदि।
(3) दस बज गए हैं।
इस वाक्य के व्यंग्यार्थ हैं – विद्यालय की
घंटी बजने वाली है। बस आने का समय हो गया है । पिताजी कार्यालय जाने वाले हैं।
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