क्षितिज भाग 2 नेताजी का चश्मा
नेताजी का चश्मा : पाठ का सारांश
'नेताजी का चश्मा' कहानी देश के
नागरिकों में देशभक्ति की भावना को दर्शाती है, भले ही वे
देश के लिए कोई बड़ा काम न कर रहे हों।
हालदार साहब का अनुभव: हालदार
साहब हर पंद्रह दिन में एक छोटे से कस्बे से गुजरते थे। वहाँ उन्होंने चौराहे पर
लगी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति को देखा, जिसकी आँखों पर संगमरमर का चश्मा नहीं था, बल्कि एक
असली चश्मा लगा होता था।
कैप्टन चश्मेवाला: हालदार
साहब को पता चलता है कि यह काम 'कैप्टन' नामक एक बूढ़ा, कमजोर और लँगड़ा व्यक्ति करता है। वह
नेताजी की मूर्ति पर असली चश्मा इसलिए लगाता है क्योंकि मूर्तिकार संगमरमर का
चश्मा बनाना भूल गया था। कैप्टन की अपनी कोई दुकान नहीं थी, वह
फेरी लगाकर चश्मे बेचता था।
पानवाले का नजरिया: पानवाला, जो हमेशा हालदार साहब को जानकारी देता था, कैप्टन का
मजाक उड़ाता है और उसे 'पागल' कहता है।
हालाँकि, हालदार साहब को यह पसंद नहीं आता क्योंकि वे कैप्टन
की देशभक्ति का सम्मान करते हैं।
कैप्टन की मृत्यु: एक
दिन हालदार साहब को पता चलता है कि कैप्टन मर गया है और मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं
है। यह देखकर वे दुखी हो जाते हैं और सोचते हैं कि अब इस देश में देशभक्ति की
भावना मर चुकी है।
भावुक क्षण: जब
वे पंद्रह दिन बाद फिर से उसी चौराहे से गुजरते हैं, तो उनकी
आँखें आदत से मूर्ति पर जाती हैं। वे देखते हैं कि मूर्ति पर सरकंडे से बना
एक छोटा सा चश्मा लगा हुआ है, जिसे बच्चों ने बनाया था। यह
देखकर हालदार साहब भावुक हो जाते हैं और उनकी आँखें भर आती हैं।
निष्कर्ष:
यह
घटना यह बताती है कि देशभक्ति किसी बड़े काम की मोहताज नहीं होती और यह छोटे-छोटे
प्रयासों में भी जीवित रहती है। यह कहानी हमें संदेश देती है कि अगली पीढ़ी में भी
देशप्रेम की भावना जिंदा है और हमें उसका सम्मान करना चाहिए।

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