क्षितिज भाग 2 लखनवी अंदाज़
लखनवी अंदाज़ : पाठ का सारांश
'लखनवी अंदाज़'
एक व्यंग्यपूर्ण कहानी है जो लेखक यशपाल ने लिखी है।
इसमें लेखक ने उस दिखावटी जीवनशैली पर व्यंग्य किया है जो वास्तविकता से दूर है।
यात्रा का प्रसंग: लेखक को अपनी नई कहानी के लिए
विचार करने हेतु एकांत चाहिए था, इसलिए उन्होंने
भीड़ से बचने के लिए ट्रेन के सेकंड क्लास का टिकट लिया। डिब्बे में पहले से ही एक
नवाब साहब बैठे थे, जिन्होंने अपने सामने तौलिए पर दो खीरे
रखे हुए थे।
नवाब साहब का व्यवहार: लेखक के आने से नवाब साहब को
असुविधा महसूस हुई और वे थोड़ा नाराज हुए। उन्होंने खीरे जैसी साधारण वस्तु का शौक
करते हुए खुद को देखे जाने पर हिचकिचाहट महसूस की।
खीरा खाने का अंदाज़: नवाब साहब ने बड़ी नफासत से खीरे
को धोया, छीला और उसके टुकड़े काटे। फिर उन पर नमक-मिर्च छिड़ककर
उसे खाने के लिए तैयार किया। लेकिन, उन्होंने लेखक के सामने
खीरा खाने की अपनी इच्छा को दबा लिया। उन्होंने खीरे के एक-एक टुकड़े को सूँघा और
फिर बिना खाए ही उसे खिड़की से बाहर फेंक दिया।
दिखावे की पराकाष्ठा: खीरे को फेंकने के बाद,
नवाब साहब ने एक गहरी डकार ली और लेखक से कहा कि खीरा होता तो
स्वादिष्ट है, लेकिन आसानी से पचता नहीं है।
लेखक का व्यंग्य: नवाब साहब के इस दिखावटी व्यवहार
को देखकर लेखक ने सोचा कि जब केवल सुगंध और स्वाद की कल्पना से पेट भर सकता है,
तो बिना किसी घटना, पात्र या विचार के 'नई कहानी' भी लिखी जा सकती है। यह लेखक का दिखावे और
बनावटीपन पर गहरा व्यंग्य था।
यह कहानी दिखावे की
संस्कृति और उस पर पनपे खोखलेपन पर तीखा प्रहार करती है।

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