क्षितिज भाग 1 उपभोक्तावाद की संस्कृति
उपभोक्तावाद की संस्कृति –
संक्षिप्त नोट्स
- लेखक
बताते हैं कि आधुनिक जीवन में उपभोक्तावाद
तेजी से बढ़ रहा है,
जहाँ हर चीज़ का उद्देश्य केवल उत्पादन
और उपभोग रह गया है।
- बाज़ार में नई-नई वस्तुएँ आती रहती हैं जो हमें अपनी ओर आकर्षित करती हैं और सुविधा व दिखावे की संस्कृति को बढ़ावा देती हैं।
- साधारण
चीज़ों से लेकर महँगी वस्तुओं तक, हर क्षेत्र में प्रतिष्ठा
दिखाने की होड़ लगी है – जैसे सौंदर्य
प्रसाधन, कपड़े, गाड़ियाँ, होटल, स्कूल आदि।
- विज्ञापनों की
शक्ति लोगों को उपभोक्तावाद की ओर खींचती है, जिससे हमारी
पारंपरिक संस्कृति और नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है।
- लेखक चेतावनी देते हैं कि पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण से हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं और सामाजिक व आर्थिक असंतुलन बढ़ रहा है।
- अंत में
लेखक कहते हैं कि उपभोक्तावाद से नैतिकता का पतन, संसाधनों
की बर्बादी और सांस्कृतिक
संकट पैदा होगा।
क्षितिज भाग 1 उपभोक्तावाद की संस्कृति
Reviewed by साहित्य संगम
on
September 03, 2025
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