कक्षा 11 हिन्दी अनिवार्य वितान राजस्थान की रजत बूंदें
राजस्थान की रजत बूंदें – Short Notes
✍️ लेखक
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अनुपम मिश्र
🌿 मुख्य विषय
- राजस्थान की मरुभूमि में वर्षा के मीठे जल के संरक्षण की पारंपरिक व्यवस्था।
- “कुंई” (Rainwater Storage Well) और उन्हें बनाने वाले चेलवांजी का महत्व।
💧 प्रमुख बिंदु
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कुंई का निर्माण
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वर्षा के जल को रेत के नीचे से संचित करने हेतु बनाया जाता है।
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कुएँ से छोटा व्यास, परंतु गहराई लगभग बराबर।
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इसमें “रेजाणी पानी” (रेत में समाया वर्षा का जल) इकठ्ठा होता है।
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चेलवांजी (कुंई खोदने वाले)
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विशिष्ट कौशल वाले लोग, जिन्हें “चेलवांजी” या “चेजारो” कहा जाता है।
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कुंई की खुदाई को “चेजा” कहते हैं।
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कार्य अत्यंत कठिन व जोखिमभरा।
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पानी के प्रकार
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पालर पानी – सीधे वर्षा से धरातल पर मिलने वाला जल।
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पाताल पानी – भूजल (आमतौर पर खारा)।
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रेजाणी पानी – खड़िया पत्थर की परत पर अटका मीठा जल (कुंई का स्रोत)।
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खड़िया पत्थर की परत
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वर्षा का जल खारे पानी में मिलने से रोकती है।
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इसी वजह से रेगिस्तान में मीठा पानी उपलब्ध होता है।
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कुंई की विशेषताएँ
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छोटा व्यास → पानी आसानी से निकालना व वाष्पीकरण से बचाव।
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ढक्कन से ढकना → स्वच्छता बनाए रखना।
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पानी धीरे-धीरे बूँद-बूँद इकठ्ठा होता है।
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निर्माण विधि
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ईंट की चिनाई, खींप की रस्सियों, लकड़ी की टहनियों से बाँधाई।
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गहराई बढ़ने पर ऊपर से रेत फेंककर हवा पहुँचाई जाती है।
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सामाजिक महत्व
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कुंई व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वजनिक भूमि पर बनाई जाती है।
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पहले सफल खुदाई पर उत्सव व भोज आयोजित होता था।
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चेलवांजी को विशेष भेंट व सम्मान दिया जाता था।
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