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भारतीय आर्य भाषाओं का विकास

 

भारतीय आर्य भाषाओं का विकास

भारत की आर्य भाषाएं अपने इतिहास और विकासक्रम में तीन प्रमुख कालों में विभाजित की जाती हैं: प्राचीनमध्यकालीन, और आधुनिक। यहां हम प्राचीन और मध्यकालीन चरणों का संक्षिप्त और स्पष्ट विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं:

1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा

1. वैदिक संस्कृत (2000 ई.पू. – 800 ई.पू.)

  • यह भारत की सबसे प्राचीन ज्ञात भाषा है, जिसमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद सहित वैदिक साहित्य की रचना हुई। इसे वैदिकी या छांदस भाषा भी कहते हैं।
  • वैदिक साहित्य को तीन वर्गों में बांटा गया है: संहिताब्राह्मण, और उपनिषद।
  • डॉ. धीरेन्द्र वर्मा आदि के अनुसार वैदिक संस्कृत में 13 स्वर और 39 व्यंजन (कुल 52 ध्वनियाँ) होती थीं।

2. लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. – 500 ई.पू.)

  • पाणिनि की अष्टाध्यायी के अनुसार व्यवस्थित रूप में विकसित संस्कृत को लौकिक संस्कृत कहते हैं। यह व्याकरण-सम्मत, साहित्यिक एवं शिक्षित वर्ग की भाषा रही है।
  • लौकिक संस्कृत में 48 ध्वनियाँ थीं, क्योंकि वैदिक संस्कृत की कुछ ध्वनियाँ जैसे , ळह, जिह्वमूलीय और उपध्मानीय लुप्त हो गईं।

2. मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा

  • इस चरण को तीन भागों में विभाजित किया गया है:

पालि (500 ई.पू. – 1 ई.)

  • पालि का अर्थ है: बुद्ध वचन की भाषा।
  • त्रिपिटक ग्रंथ (सुत्त पिटक, विनय पिटक, अभिधम्म पिटक) इसी भाषा में रचे गए।
  • सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र द्वारा पालि को श्रीलंका में प्रचारित किया गया।
  • पालि को भारत की पहली देशभाषा माना जाता है।

प्राकृत (1 ई. – 500 ई.)

  • प्राकृतका अर्थ है: प्राकृतिक या मूल जनभाषा।
  • यह संस्कृत की अपेक्षा सरल, सहज और बोलचाल की भाषा रही है।
  • जैन और बौद्ध साहित्य में इसका व्यापक प्रयोग हुआ।
  • वाक्पतिराज के अनुसार: जिस प्रकार सारे जल सागर से निकलते और उसमें मिलते हैं, वैसे ही भाषाएं प्राकृत से उत्पन्न और उसमें विलीन होती हैं।

अपभ्रंश (500 ई. – 1000 ई.)

  • अपभ्रंशका अर्थ है: विकृत या बदली हुई भाषा।
  • यह आधुनिक भाषाओं जैसे हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगाली आदि की जननी मानी जाती है।
  • इसे मध्य और आधुनिक आर्य भाषाओं के बीच की कड़ी कहा गया है।
  • अनेक कवियों और लेखकों ने अपभ्रंश में साहित्य रचा।
  • आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ (1000 ई. से अब तक)
  • आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का विकास अपभ्रंश से हुआ है। इसका समयकाल 1000 ई. से वर्तमान तक माना जाता है। यह कालखंड भारत के स्वतंत्रता से पहले के स्वरूप को शामिल करता है, जिसमें आज के पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार के क्षेत्र भी शामिल माने जाते हैं।

 

भारतीय आर्य भाषाओं का विकास Reviewed by साहित्य संगम on August 28, 2025 Rating: 5

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